हॉकी के जादूगर को भारत रत्न सम्मान देने से क्यों हिचक रही है सरकार

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मेजर ध्यानचंद की याद में हर साल उनके जन्मदिवस (29 अगस्त) को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है. इस दिन खिलाड़ियों को खेल पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है. उनके नाम पर खेल में आजीवन उपलब्धि के लिए खेल मंत्रालय द्वारा मेजर ध्यानचंद पुरस्कार दिया जाता है.

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ध्यानचंद हॉकी स्टिक से बॉल को आगे ले जाते हुये / फ़ोटो : letsinspire

11 अप्रैल 2011 को भाजपा से लोकसभा सांसद मधुसूदन यादव ने तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम को एक ख़त लिखा. इसमें उन्होंने मांग की कि सचिन तेंदुलकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिया जाए. इसके लिए सरकार द्वारा ‘भारत रत्न’ दिए जाने के नियमों में बदलाव किया जाए और खेलों को भी योग्यता सूची में जोड़ा जाए.

Bharat Ratna photo
Bharat Ratna photo (file pic)

उस समय तक भारत का ये सर्वोच्च नागरिक सम्मान साहित्य, कला, विज्ञान और जनसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों को ही दिया जाता था. नतीजतन बड़ी बहस के बाद भारत रत्न दिए जाने के नियमों में संशोधन हुआ. तय हुआ कि किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों अथवा विशिष्ट उपलब्धि हासिल करने वालों को भारत रत्न से सम्मानित किया जा सकेगा. यहां से खिलाड़ियों को भी ये सम्मान मिलने लगे.

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सचिन तेंदुलकर / फ़ोटो : thehindubusinessline

सचिन तेंदुलकर तब हर भारतीय के दिल पर राज करते थे. क्रिकेट में बल्लेबाज़ी का लगभग हर रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके थे. वे देश में खेलों का पर्याय बन चुके थे. क्रिकेट के भगवान के नाम से पहचाने जाने लगे थे. इसलिए जब खिलाड़ियों को भारत रत्न देने का रास्ता खुला तो ध्यानचंद का दावा किसी भी दृष्टि में सचिन से कम नहीं था. लेकिन कई नाटकीय घटनाक्रम के बाद 2013 में सचिन को तो भारत रत्न से सम्मानित कर दिया गया लेकिन ध्यानचंद का इंतज़ार अब भी जारी है.

ध्यानचंद के नाम को लेकर कितनी बार नाटकीय घटनाक्रम हुया?

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सैंड आर्ट / फ़ोटो : timesnow

विडंबना देखिए कि उनके नाम पर पुरस्कार बांटे जाते हैं लेकिन जिस पुरस्कार और सम्मान के वे हक़दार हैं, उन्हें आज तक वो सम्मान नसीब नहीं हुया. 2011 से हर वर्ष खेल दिवस के समय हॉकी जगत और खेल जगत से खिलाड़ी ध्यानचंद के लिए भारत रत्न देने की मांग उठाते आए है.

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अशोक ध्यानचंद / फ़ोटो : jagran

ध्यानचंद के बेटे और खुद 1975 की विश्वविजेता भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा रहे अशोक ध्यानचंद 2012 से ही खेल मंत्रालय और सरकार से अपने पिता को भारत रत्न दिए जाने की मांग कर रहे है, लेकिन खेल मंत्रालय और सरकार उनकी मांग पर ध्यान ही नहीं दे रही है. 2012 से अब तक खेल मंत्रालय चार बार ध्यानचंद के नाम की सिफारिश भारत रत्न के लिए कर चुका है लेकिन सरकार की अलग मंशा के कारण नाम सिफ़ारिश होने के बाद भी भारत रत्न किसी और को मिल जाते है.

अशोक कुमार की अगुवाई में छह सदस्य का प्रतिनिधिमंडल 12 जुलाई 2013 को खेलमंत्री जितेंद्र सिंह से मिला. जिसके नाद खेल मंत्रालय ने ध्यानचंद के नाम को आगे बढ़ाया. अपनी मांग के समर्थन में पूर्व हॉकी खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करके प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा. सवाल उठाया कि सचिन के साथ ध्यानचंद को भी सम्मानित करने में क्या बुराई है? लेकिन नतीजा सचिन के पक्ष में रहा.

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मेजर ध्यानचंद / फ़ोटो : द वायर

2014 में केंद्र में सरकार बदल गई लेकिन यह ख़बर ज़रूर आईं कि गृह मंत्रालय ने ध्यानचंद का नाम प्रधानमंत्री को प्रस्तावित किया है. लेकिन भारत रत्न तब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित मदन मोहन मालवीय को मिला. इस तरह तीसरी बार भी हॉकी के जादूगर का जादू नहीं चला.

अब इस साल जून में चौथी कवायद शुरू हुई. खेल मंत्रालय ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर ध्यानचंद को भारत रत्न देने का आग्रह किया.

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मेजर ध्यानचंद की प्रतिमा / फ़ोटो : fansofhockey

सियासी चूल्हे जलाने और ध्यानचंद के लिए उठ रही मांग को शांत करने के लिए खेल मंत्रालय उनके नाम की सिफारिश की बात कहता रहा और दो सालों का समय निकाल दिया. RTI कार्यकर्ता हेमंत दुबे ने सूचना के अधिकार के तहत पूछा कि सचिन के नाम को भारत रत्न सम्मान देने के कितना समय लगा, तो उन्हें मिले दस्तावेज़ के अनुसार सचिन को भारत रत्न देने का फैसला महज़ 24 घंटे में कर लिया गया था. हेमंत ने आगे कहा कि 17 जुलाई 2013 को खेल मंत्रालय द्वारा मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने की विधिवत सिफारिश प्रधानमंत्री को भेजी गई थी, लेकिन महीनों पुरानी ध्यानचंद से जुड़ी सिफारिश पर तो विचार तक नहीं किया गया.

खिलाड़ी का क्या कहना है?

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अजय बंसल / फ़ोटो : UNB

राष्ट्रीय स्तर के हॉकी कोच अजय बंसल कहते है कि कुछ समय पहले हमने दद्दा (मेजर ध्यानचंद) के लिए प्रदर्शन किया था. उस समय मैंने दद्दा के बेटे अशोक ध्यानचंद को कहा था कि हम सम्मान क्यों मांग रहे हैं. उनकी शख़्सियत इतनी बड़ी है कि उन्हें तो यह सम्मान बिन मांगे ही मिल जाना चाहिए.

विदेशों ने नवाजा लेकिन देश ने नहीं

2015 में ब्रिटिश संसद में मेजर ध्यानचंद को ‘भारत गौरव सम्मान’ से नवाज़ा जाना था. तब अशोक मीडिया से मुखातिब होते हुए बोले कि ध्यानचंद को ब्रिटिश संसद में सम्मानित किया जा रहा है. दुनिया उनके खेल का लोहा मान रही है, लेकिन उन्हें अपने ही देश में उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है. उनकी तारीफ़ें करने में डॉन ब्रेडमैन और जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर शामिल थे. हिटलर ने जब ध्यानचंद को खेलते देखा तो वे उनके ऐसे फैन हुए कि अपने देश से खेलने का ही इन्विटेशन ही दे दिया.

अशोक ध्यानचंद ने एक इंटरव्यू के दौरान एक बार एक बात कही थी कि मेरे पिता भारत के पहले खेल सितारे थे और हमेशा रहेंगे. भले ही सरकार उन्हें ‘भारत रत्न’ सम्मान दे या न दे.

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