विजय चीखता रहा और मुम्बई पुलिस उसे तब तक मारती रही जब तक वो मर नहीं गया

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मुम्बई ये वो शहर है जिसके लिए कहा जाता है कि यहां लोगों के सपने सच होते हैं लेकिन शायद वो बात झूठी है और मुम्बई का भौकाल टाइट करने के मकसद से ही किसी ने ऐसा लिखा और बोला होगा. अब आपके जेहन में ये ज़रुर आया होगा कि आख़िर मैं ऐसा क्यों बोल रहा हूं,असल में इसकी वजह है मायानगरी में रहने वाला विजय,जिसको इतना मारा गया कि दिवाली के शोरगुल में उसने दम भी तोड़ दिया.


पूरी घटना क्या थी.
प्रत्यक्षदर्शियों की बातों पर यक़ीन करे तो घटना 27 अक्टूबर यानी दीवाली {Diwali} की रात हुई थी. रात के लगभग 11 बजने को थे,सायन कोलीवाड़ा के रहने वाले विजय सिंह {Vijay Singh}ने खाना खाया था.घूमने की आदत थी तो खाने के बाद अपने दो भाइयों के साथ बाइक {Bike} पे घूमते घूमते वडाला ट्रक टर्मिनल तक आ पहुँचें.

एक फार्मा कम्पनी में एमआर की जॉब करने वाला विजय वडाला ट्रक टर्मिनल के पास जहां अपनी बाइक खड़ी कर रहा रहा था वहीं पास में एक प्रेमी जोड़ा भी बैठा था, विजय की बाइक की लाइट जब उनके चेहरे पर पड़ी तो उनसे ये सहन नहीं हुआ और उन्होंने विजय को गालियां देनी शुरू कर दी. गाली गलौच सुनना भी हर किसी के बस में कहाँ होता है, विजय ने पलटकर जवाब दिया जिसके बाद बात और बिगड़ गयी.लड़की के साथ बैठे लड़के ने अपने दो दोस्तों को फ़ोन करके वहां बुला लिया, मामला हाथापाई तक पहुंच गया. कहा जा रहा है कि जब सूचना पर पुलिस वहां पहुंची तो उस प्रेमी जोड़े ने विजय और उसके भाइयों पर छेड़छाड़ करने का आरोप लगा दिया.

पुलिस पर आरोप है की उसने बिना किसी डिटेल्ड इन्क्वायरी के विजय ओर उसके दोस्तों को हिरासत में ले लिया और थाने लाकर बुरी तरह मारा. सिर्फ इतना ही नहीं, कहा तो यहाँ तक जा रहा कि पुलिस की मौजूदगी में भी लड़की और उसके साथी लड़के ने भी विजय और उसके भाइयों पर हाथ उठाया लेकिन पुलिस की तरफ से कोई प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली.

जब दब गयी विजय की आवाज
आरोप है कि थाने लाकर विजय सिंह को पुलिस ने बहुत बुरी तरह से मारा, उसके सीने और हाथ पाँव पर लगातार डंडे बरसाए गए. वो चीखता रहा अपने बेक़सूर होने की दुहाई देता रहा लेकिन दीवाली के दिन उसकी आवाजें पठाखें के शोरगुल में कहीं दब सी गयी थी.

28 तारीख की सुबह करीब 2.30 बजे विजय सिंह ने पुलिस स्टाफ से सीने में दर्द होने की शिकायत करते हुए पीने के लिए पानी माँगा पर पुलिस स्टाफ का रवैया उसके लिए नहीं बदला और उसे पानी भी नहीं दिया गया. परिवार वाले भी पुलिस के आगे गिड़गिड़ाते रहे लेकिन स्टाफ का दिल नहीं पसीजा. विजय उनके सामने ही तड़पता रहा पर पुलिसिया टोपी पहने स्टाफ पर कोई फर्क नहीं पड़ा, उनके रवैया को देखकर ऐसा लग था था जैसे विजय से कोई पुरानी खुन्नस निकाल रहे हो.

पिटाई के बाद धीरे धीरे विजय की तबियत बिगड़ने लगी, उसके परिवार वालों ने विजय को लॉकअप से निकालकर पंखें में लिटाने की गुहार लगाई पर इस बार उनके साथ भी गाली गलौच करते हुए चुप बैठने का इशारा कर  दिया गया. आप पुलिस के डरावने रूप का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि जब तलक विजय ज़ोर ज़ोर से सांस लेते हुए फर्श पर गिरकर बेहोश नहीं हो गया तब तक उसे लॉकअप से बाहर नहीं निकाला गया. 


जब तक लॉकअप से विजय को निकालकर घर वालों को सौंपा गया तब तक वो दम तोड़ चुका था. सिर्फ  इतने से ही पुलिस का पेट नहीं भरा, शव को ले जाने के लिए भी पुलिस ने अपनी गाडी देने से मना कर दिया बाद में परिजनों को प्राइवेट टैक्सी को बुलाकर विजय के शव को घर ले जाना पड़ा.


मुंबई पुलिस से इस तरह के कृत्य की उम्मीद करना बेमानी सा लगता है लेकिन अब इस घटना के सामने आने के बाद पूरे देश में हलचल मची है. सोशल मीडिया पर लगातार दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की मांग की जा रही है.लोगों की तरफ से किये जा रहे विरोध का ही परिणाम है कि प्रशासन की तरफ से भी आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच बैठा दी गयी है.बाकी इस जांच में होगा क्या ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

वैसे घटना को देखने वालों की बातों पर यकीन करे तो विजय एकदम निर्दोष था जिसको उस कपल से मुँह बहस करने की सज़ा जीवन गंवा कर चुकानी पड़ी, एक बारगी अगर मान भी ले कि वाकई विजय ने छेड़छाड़ की भी थी तो भी उससे इस तरह के बर्ताव का क्या मतलब था ?? क्या इंसानियत नाम का शब्द पुलिस वालों ने कभी नहीं सुना है ??  जनता के सेवक कहे जाने वाले पुलिसकर्मी क्या सचमुच में हमारे सेवक ही हैं ? 


फिलहाल प्रशासन पर पड़ते दबाव के बीच जांच तो होंगी, दो चार को कुछ समय के लिए महकमें से निकाल भी दिया जाएगा लेकिन घटना के पुराने पड़ते ही सबकी वापिस से बहाली भी हो जाएगी.लीपा पोती करने में पुलिस और हमारी व्यवस्था वैसे भी कोई नए खिलाड़ी थोड़े हैं. उम्मीद है इस बार कुछ अच्छा हो…..

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