वो महिला जो भेष बदलकर करती थी क्रांतिकारियों की मदद

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भारत को आजाद कराने में पुरुषों का हर दम साथ महिलाओं ने भी दिया है. अंग्रेज़ो के दाँतो तले चने चबवाने में महिलाओं की भी ख़ास भूमिका रही है. अंग्रेज़ो से लड़ते हुये ईंट से ईंट बजाने का दम खम रखने वाली उन्हीं महिलाओं में से एक महिला स्वतन्त्रता सेनानी का जिक्र आज के इस पोस्ट में करने जा रहा हूँ. यकीन दिलाता हूँ दिल से वंदे मातरम और इस महिला के लिए सलाम निकलेगा.

मैं समय हूँ. आज मैं आपको भारत जब आजाद होने के लिए लड़ रहा था वहां लेकर जाऊंगा. देश को आजादी दिलाने के लिए सारे देशवासी अपना दमखम दिखाने में जुटे हुये है. साल था 1913 और तारीख थी 27 जुलाई इस दिन जिस बच्ची ने जन्म लिया उसने अपने साथ-साथ अपने माँ-बाप का भी नाम रोशन कर दिया.

Kalpana Dutt
कल्पना दत्त / फ़ोटो : thebetterindia

चटगांव के श्रीपुर गाँव मे एक मध्यम वर्गीय परिवार में कल्पना दत्त ने जन्म लिया. अब चटगांव बँटवारे के बाद बांग्लादेश में है. कल्पना को भी नहीं पता था कि वो एक दिन स्वतन्त्रता संग्राम में अपना योगदान देगी. कल्पना का योगदान बड़ा ही अहम योगदान था. अपनी प्रारम्भिक पढ़ाई चटगांव से ही की और 1929 में मैट्रिक की परीक्षा पास करके कलकत्ता में दाखिला ले लिया. बेथ्युन कॉलेज से विज्ञान में बेचलर डिग्री का कोर्स करने लगी. यहाँ पर कल्पना ने क्रांतिकारियों के बारे में ज़्यादा सुना और पढ़ा.

फिर समय का पहिया घूमता गया और कल्पना की रूह को भी भनक ना लगी कि कल्पना आजादी की लड़ाई में कूद गयी है. कल्पना कॉलेज के छात्र संघ से जुड़ गई. छात्र संघ से जुडने के बाद उनकी मुलाक़ात बीना दास और प्रीतिलता वड्डेदार जैसे क्रांतिकारी महिलाओं से हुई. जो क्रांतिकारी गतिविधिययों में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रही थी.

surya sen
सूर्य सेन / फ़ोटो : roar

इसी दौरान कल्पना की मुलाक़ात स्वतन्त्रता सेनानी सूर्य सेन, जिसे सब ‘मास्टर दा’ बोलते थे, उनसे हुई. उनकी बातों को सुनकर कल्पना बहुत प्रभावित हुई. उसी का नतीजा रहा कि कल्पना सूर्य सेन के संगठन ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी’ में शामिल हो गईं. इसके बाद कल्पना खुलकर अंग्रेजों के खिलाफ अपनी मुहिम छेड़ चुकी थीं.

1930 में जब संगठन ने ‘चटगांव विद्रोह’ किया तब कल्पना और उनके साथी ब्रिटिश पुलिस के नजरों में आ गए. इस वजह से कल्पना को कलकत्ता से वापस अपने गाँव जाना पड़ा. लेकिन कल्पना अपने गाँव से ही सूर्य सेन और उनके साथियों की मदद करने लगी. कल्पना को कलकत्ता से विस्फोटक सामग्री सुरक्षित ले जाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. कल्पना चटगांव में गुप्तरूप से संगठन के लोगों को हथियार पहुँचाने लगीं. इस काम में उनका साथ प्रीतिलता देती थी.

कल्पना और प्रीतिलता को यूरोपियन क्लब पर बम फेंकने की ज़िम्मेदारी दी गयी. इस योजना को अंजाम देने के लिए उन्होंने अपना भेष बदल लिया और पुरुष-वेश में अपनी योजना को अंजाम देने के लिए जुट गए. उन्होंने सूर्य सेन से बंदूक आदि चलाने का प्रशिक्षण रात के अंधेरे में लिया, पर ब्रिटिश पुलिस को उनकी इस योजना की भनक पड़ गयी और तय दिन से लगभग एक हफ्ते पहले उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

बाद में, मुकदमे के दौरान उन पर ये आरोप सिद्ध नहीं हुआ और उन्हें छोड़ दिया गया. पर इसके बाद पुलिस ने उनकी हर एक हरकत पर कड़ी नज़र रखनी शुरू कर दी. यहां तक की उनके घर पर भी पुलिस का पहरा लगा दिया गया था. लेकिन वे बड़ी ही चालाकी से पुलिस को चकमा देकर सूर्य सेन की मदद के लिए भाग निकली.

इसके बाद कल्पना दो साल तक अंडरग्राउंड हो गईं और गुप्त रूप से क्रांतिकारी आंदोलनों में हिस्सा लेती रहीं. दो साल बीत जाने के बाद पुलिस सूर्य सेन का ठिकाना पता लगाने में सफल रही. 17 फ़रवरी 1933 को पुलिस ने सूर्य सेन को गिरफ्तार कर लिया, जबकि कल्पना अपने साथी मानिन्द्र दत्ता के साथ भागने में कामयाब रहीं. कुछ महीनों तक कल्पना इधर-उधर छुपती रहीं, मगर मई 1933 को पुलिस ने कल्पना घेर कर पकड़ ही लिया.

जब इन क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलाया गया तब 1934 में सूर्य सेन और उनके साथी तारकेश्वर दस्तीकार को फांसी की सजा सुनाई गई. जबकि, कल्पना दत्त को उम्र कैद की सजा हुई. मगर भगवान को कुछ और ही मंजूर था. वो तो अपना ही खेल, खेल रहे थे. 21 साल की कल्पना केवल ये सोच रही थी कभी वो बाहर जा सकेगी या इस चारदीवारी में ही उसको आगे पूरी जिंदगी निकालनी होगी. 1937 में महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ क्रांतिकारियों को रिहा करने के लिए अभियान शुरू कर दिया था. उसी अभियान का नतीजा रहा कि 1939 में कल्पना रिहा हो गयी थी.

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पूरन चंद जोशी / फ़ोटो : roar

रिहा होने के बाद कल्पना ने अपनी पढ़ाई पूरी करने का फैसला लिया. उसी के चलते उन्होने कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपना एडमिशन करवा लिया. बेचलर की डिग्री लेने के बाद कल्पना भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गईं. 1943 में कल्पना ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पूरन चंद जोशी से शादी कर ली. शादी के बाद कल्पना दत्त बन गयी थी कल्पना जोशी. ये वही दौर था जब बंगाल की स्थिति अकाल और विभाजन के चलते गंभीर थी. कल्पना ने इस समय बंगाल के लोगों के साथ हमदर्दी बांटी और राहत कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया था. इसके बाद कल्पना देश की आज़ादी के साथ ही भारतीय राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाने लगी.

वह बंगाल से दिल्ली आयीं और इंडो-सोवियत सांस्कृतिक सोसायटी का हिस्सा बनीं. साल 1979 में कल्पना को ‘वीर महिला’ की उपाधि से नवाज़ा गया. 8 फ़रवरी 1995 को कल्पना ने दिल्ली में इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. खैर, कल्पना ने दो बच्चों को जन्म दिया था. जिनका नाम चांद जोशी और सूरज जोशी था. चांद जोशी एक बहुत बड़े पत्रकार रह चुके हैं. जिनकी पत्नी मानिनी ने इनके ऊपर एक उपन्यास ‘डू एंड डाई: चटग्राम विद्रोह’ लिखा था.

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खेले हम जी जान से / फ़ोटो : roar

2010 में भारतीय सिनेमा जगत ने भी इन पर आधारित एक फिल्म बनाई थी. इस फिल्म का नाम ‘खेलें हम जी जान से’ जो आशुतोष गोवारिकर के निर्देशन में बनी थीं. इस मूवी की कहानी मानिनी के उपन्यास से ही ली गई थीं. इसमें अभिषेक बच्चन और दीपिका पादुकोण ने मुख्य किरदार की भूमिका निभाई है. इस फिल्म में चटगांव विद्रोह को बखूबी दिखाया गया, जिसमें लगभग सभी रियल पात्रों को भी दर्शाया गया था. इस फिल्म में दीपिका पादुकोण ने कल्पना दत्त का रोल अदा किया था.

कल्पना दत्त ने खुद को देश के लिए समर्पित कर दिया, उसके लिए वह हमेशा याद की जाएँगी. द पंचायत इस महान क्रांतिकारी को सलाम करता है.

the panchayat

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