Bihar: तेजी से विकसित होने वाला राज्य लेकिन आज भी उन्हें बस लड़का ही चाहिए

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जहां एक तरफ बिहार भारत का तेजी से विकसित राज्य बनने का टैग अपने नाम कर रहा है वहां दूसरी तरफ शिशु लिंगानुपात में अंधेरे में डूबा जा रहा है.

Sex ratio
शिशु लिंगानुपात / फ़ोटो : haryanaexpress.in

रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के तहत संचालित नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) ने साल 2017 में एक रिपोर्ट पेश की थी जिसमें बिहार की जन्म दर भारत के बाकी राज्यों से सबसे अधिक 26.4 रही यानि बिहार में शिशु का जन्म ज्यादा हुआ था. वही भारत के शहरी क्षेत्रों में औसत जन्म दर 16.8 और ग्रामीण क्षेत्रों में औसत जन्म दर 21.8 रही. लेकिन बाल लिंगानुपात में गिरावट दर्ज करवाई. साल 2011 में जहां प्रति 1000 पुरुषों पर 910 महिलाएं थी वो अब 900 पर जा टिकी है.

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लिंग चिन्ह / फ़ोटो : chalochaley.net

विडम्बना की बात देखिये बिहार के शहरी इलाकों में लिंगानुपात ग्रामीण इलाकों से ज़्यादा हुआ है. यानि ग्रामीण इलाकों में बेटियों को जन्म देने से लोग कतराते नहीं है वही ‘शिक्षित’ शहरी इलाके के लोग बेटियाँ नहीं चाहते है. साल 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार के शहरी इलाकों में प्रति 1000 पुरुषों पर 884 महिलाएं थी जो अब 865 रह गयी है.

Dr Arun Shah
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ ॰ अरुण शाह / फ़ोटो : thewire.in

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ॰ अरुण शाह कहते है ‘यह सिर्फ इसलिए है कि जो लोग गांवों में रहते हैं, उनके पास जन्म पूर्व लिंग चेक करने का कोई ख़ास जरिया नहीं है. छह बेटियों के बाद पैदा हुए अपने बेटों के साथ असंख्य मरीज मुझसे मिलने आते हैं. अभी भी बालिकाओं के स्वास्थ्य और पोषण की गंभीर उपेक्षा यानि ध्यान नहीं रखा जाता है. वास्तव में, बिहार के बाशिंदों मे एक जुनून चढ़ा हुया है कि उन्हें बस लड़का ही चाहिए.’

Health Department of Bihar
फ़ोटो : health.bih.nic.in

बिहार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2015 में एक दस्तावेज़ पेश किया था जिसके अंदर जो आंकड़े बताए गए उसने सभी को अचंभित कर दिया. उस रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में 43 फीसद गर्भधारण अवांछित है और 79 फीसद गैर कानूनी तरीके से गर्भपात होता है. ज़्यादातर मामलों में देखा गया है कि बेटी की तुलना में बेटे को पौष्टिक आहार दिया जाता है. जिससे बेटी की हालात मरने जैसी हो जाती है.

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डॉ॰ अरुण शाह / फ़ोटो : im4change.org

इस बारे में डॉ॰ शाह कहते है कि सारे तथ्य सिक्का उछालने जैसा ही है जिसमें ये पता नहीं होता कि नवजात लड़का होगा या लड़की. इसलिए, सैद्धांतिक रूप से, हमारे पास बिहार में ऐसा कोई लिंगानुपात नहीं हो सकता है. यह स्पष्ट रूप से प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण का परिणाम है.

2016 से लिंग निर्धारण के मामलों में बिहार में 200 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की गई हैं. जून 2019 में, जब राज्य में एक्यूएट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) से संबंधित 129 बच्चों की मौत हुई थीं, जिनमें से 85 लड़कियां थीं.

अधिकाँश मौतें बालिकाओं की उपेक्षा के कारण हुई है, जिनके माता-पिता ने अपनी बेटी को खाली पेट या पर्याप्त मात्रा में भोजन के बिना सोने दिया.

बेटा पैदा करने के लिए किस हद तक जाते है?

बिहार के अंदर लड़का ही जन्म ले इसके लिए ग्रामीण और शहरी इलाके वाले बहुत सारे जतन और प्रयोग करते है. कुछ भयानक कहानी आपसे साझा करता हूँ.

kill girl child
लड़की की हत्या / फ़ोटो : newsindianexpress.com

इंडिया टुडे के अनुसार, अक्टूबर 2018 में, बिहार के सीतामढ़ी में एक परिवार ने अपनी सबसे बड़ी बहू की गला काटकर हत्या कर दी, क्योंकि एक गृहस्वामी ने उन्हें ‘बलिदान’ करने के लिए कहा ताकि घर में एक लड़का पैदा हो सके. इस साल जनवरी में, अरारा में एक महिला को बचाया गया था, जब उसके पति और सास-ससुर लड़की को जन्म देने के लिए आग लगाने वाले थे.

Bihar Sex Ratio
शिशु लिंगानुपात / फ़ोटो : indaitoday.in

बिहार की 10.41 करोड़ (जनगणना 2011) की जनसंख्या में से लगभग 55 लाख पुरुष हैं. यह न्यूजीलैंड, नॉर्वे या आयरलैंड की पूरी आबादी से अधिक है. लड़कों के लिए बिहार के जुनून ने पहले ही असंतुलन पैदा कर दिया है और इससे जनसांख्यिकीय संकट पैदा हो सकता है. इस मामले पर सरकार को विचार और सख़्त कार्यवाई करने की जरूरत है.

the panchayat

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