संसद के कैंटीन की रेट लिस्ट देखकर आप भी कह उठेंगे, असली गरीब तो देश के नेता हैं!

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Parliament Canteen Plate

इंसान की जिंदगी के तीन मूलभूत आवश्यकता होती है और वो रोटी,कपड़ा और मकान है. इंसान के बदन पर कपड़ा ना हो और सर के ऊपर छत ना हो तो भी इंसान ज़िंदगी जी लेगा. लेकिन पेट में अन्न ना हो तो ज़िंदगी काटनी आसान नहीं होती है. इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी बस दो जून की रोटी कमाने के लिए भागता रहता है. बस ऊपर वाले से एक ही दुआ करता है कम से कम खाने के लिए रोटी मिल जाए. गरीब लोग सरकार की योजनाओं पर निर्भर होते है, लेकिन देश को चलाने वाले नेता लोग तो बड़े ही आराम से खाना खाते है और वो भी कम दाम में. हाँ जी, बिलकुल सही सुना आपने. नेता लोग संसद की कैंटीन से बहुत ही सस्ते दाम में खाना खाते है. आज का ये पोस्ट उसी पर है.

parliament
भारतीय संसद भवन / फ़ोटो : aajtak

कभी आपने सोचा है कि देश की संसद में जो कैंटीन है. उसमें बाजार के भाव से भी सस्ते दाम में खाना क्यों परोसा जाता है? अगर नहीं सोचा तो आज का पोस्ट सोचने और समझने में मजबूर कर देगा. इतना सस्ता खाना तो बाहर किसी भी कैंटीन में ना मिलता हो जितना सस्ता संसद की कैंटीन में मिलता है. और यहाँ आम जनता जा भी नहीं सकती है. ये कैंटीन केवल सांसद, भूतपूर्व सांसद, उनके परिवार वाले, मीडिया, संसद में काम करने वाले कर्मचारियों और घूमने आए वेलिड पास(valid pass) के साथ पर्यटकों के लिए ही खास खुली रहती है.

संसद की कैंटीन में खाना सस्ता मिलता है मैं उसके खिलाफ नहीं हूँ और ना ही वो मेरा मुख्य मुद्दा है. मुख्य मुद्दा ये है कि जनता से सरकार झूठ बोल रही है कि कैंटीन के खाने के दाम “नो-प्रॉफ़िट, नो-लॉस (no-profit, no-loss)” पर निर्धारित किए जा रहे है. इसको समझने के लिए आपको कुछ साल पहले चलना होगा यानि की फ़्लैशबैक की दुनिया में जाना होगा.

नो-प्रॉफ़िट, नो-लॉस का नोटिस जारी किया

साल था 2015 और तारीख थी 31 दिसंबर. लोकसभा में एक नोटिस जारी किया गया उसमें लिखा था कि समिति की रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद, अध्यक्ष ने कई फैसले लिए. जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण यह है कि संसद में कैंटीन अब ‘नो-प्रॉफिट, नो-लॉस’ के आधार पर काम करेगी. उसके हिसाब से खाने की चीजों के दाम में वृद्धि हुई है और इन्हें बनाने की वास्तविक लागत पर बेचा जाएगा. और साथ ही ये कल से प्रभावी होगा.

Parliament canteen rate list
भारतीय संसद की कैंटीन

तो उस नोटिस के हिसाब से नए साल यानि 2016 की पहली तारीख को दामों में जो बढ़ोतरी हुई वो प्रभावी हो जाएगी. 1 जनवरी 2016 से संसद की कैंटीन में ‘नो-प्रॉफिट, नो-लॉस’ के तर्ज़ पर जो दाम निर्धारित किए है वो लागू होंगे. ये स्टेटमेंट सुनने के बाद आम लोगों ने थोड़ी राहत की सांस ली कि चलो अब वो भी उतने में ही खाएँगे जितने में हम खा रहे है. लेकिन लेकिन लेकिन…… कहानी तो अब शुरू हुई थी.

सच्चाई सामने आई

RTI by ashok upadhayay
RTI एक्टिविस्ट अशोक उपाध्याय के RTI की कॉपी / फ़ोटो : indiatoday

RTI के जरिये अशोक उपाध्याय नाम के शख्स ने संसद में स्थित कैंटीन में बेचे जाने वाले आइटम्स और उनके मूल्यों की जानकारी संसद भवन के कार्यालय से मांगी. जिसका जवाब कार्यालय से मिला वो चौंका देने वाला था. सरकार ने जो बोला था वो तो किया ही नहीं. हाँ ये जरूर मानता हूँ कि बढ़ोतरी की है लेकिन मार्केट के हिसाब से नहीं की है. केवल पिछली रेट्स में 50 प्रतिशत की वृद्धि करके नई रेट्स बना दी गई. मतलब कि आम जनता के साथ सरासर धोखा कर दिया. संसद की कैंटीन में जो चीज बेची जाती है उसके भाव बताने से पहले मैं आपको ये बताता हूँ कि संसद की कैंटीन में भावो और कौनसी चीज बेची जाएगी उसका काम कौन करता है.

संसद में फूड के ऊपर निर्णय कौन लेता है?

संसद भवन में फूड मैनेजमेंट(Food Management) के लिए एक समिति(committee) बनाई जाती है. उस समिति में लोकसभा से 10 सांसद और राज्यसभा से 5 सांसद होते है. समिति का कार्यकाल 1 साल का होता है और समिति का काम ये होता है –

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भोजन / फ़ोटो : indiatimes

1) संसद भवन परिसर में स्थित रेलवे कैटरिंग यूनिटों में परोसे जाने वाले खाने की दरों में संशोधन पर विचार करना
2) संसद भवन परिसर में रेलवे कैटरिंग इकाइयों को चलाने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी के स्तर पर विचार करना
3) सदस्यों को उत्कृष्ट कैंटीन सेवाओं के प्रावधान पर विचार करना
4) अन्य संबंधित मुद्दों पर विचार करने के लिए

northern railway
उत्तरी रेलवे / फ़ोटो : meramaal

चलो तो अब आप जान गए होंगे कि कौन भाव निर्धारित करता है. कैंटीन में रेलवे की तरफ से कैटरिंग का काम संभाला जाता है. कैंटीन में मिलने वाले आइटम्स पर 80 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है जिससे कैंटीन में खाना सस्ता मिलता है. आपको ये भी बता दूँ कि ये सब्सिडी देश के करदाताओं के पैसे के ऊपर मिलती है. मतलब कि नेता के खाने के पैसे में करदाता के भी अप्रत्यक्ष रूप से पैसे लगते है. ये ही कारण था कि 2015 को दाम बढ़ाने की मांग की गई थी. लेकिन RTI के जरिए पता चला तो ढाक के तीन पात ही निकले.

2015 में और 2016 में क्या मूल्य था

चलो अब बिना देरी किए आपको बता देता हूँ कि 2015 में क्या भाव थे जो बढ़ा कर 2016 में किए गए.

आइटम2015 का भाव2016 का भाव
चाय45
कॉफी45
मटन करी2045
चिकन करी2950
वेजिटेबल कटलेट1018
चपाती12
दाल25
Parliament canteen rates RTI
Parliament canteen rates RTI
Parliament canteen rates RTI
अशोक उपाध्याय के RTI का जवाब लोकसभा सचिवालय से मिलता हुया / फ़ोटो : indiatoday

जैसा कि आपने देखा की कैंटीन में खाने के दाम कितने सस्ते है. अगर नेता एक कटोरी दाल और 2 रोटी खाता है तो उन्हे केवल महज़ 9 रुपए खर्च करने होंगे. वही अगर आम आदमी किसी ढाबे पर खाना खाने जाये तो केवल रोटी के ही 5 रुपए लग जाये. बाकी का खाना तो छपर फाड़ देता है.

कितनी सब्सिडी ली गई

अगर सब्सिडी की बात करे तो 2012 से लेकर 2015 तक सब्सिडी में बढ़ोतरी ही हुयी है और 2015-2016 में केवल 57 लाख रुपए ही कम हुये है. चलिये जानते है 2012 से लेकर 2016 तक वित्तीय वर्षों में कितनी सब्सिडी मिली.

वित्तीय वर्षनेट सब्सिडी (रुपए)
2012-201312.52 करोड़
2013-201414.09 करोड़
2014-201515.85 करोड़
2015-201615.97 करोड़
2016-201715.40 करोड़

करदातों के कर के पैसो से नेता लोग बहुत ही सस्ता खाना खाते है. आम जनता दर-दर की ठोकरें खाने के बाद भी इतना सस्ता खाना अफोर्ड नहीं कर पाते है.

the panchayat

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