क्या है एनआरसी जिसकी वजह से घुसपैठियों का हो जाएगा ईलाज

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देश में मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल शुरू हो गया है और उसके साथ ही नरेंद्र मोदी ने भी अपने काम करना शुरू कर दिए हैं। सरकार के एक बार फिर सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने पहले तो जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाया और अब उनके दूसरे वादे को पूरा करने का समय आ गया है। लेकिन मोदी का दूसरा वादा है क्या ? मोदी का दूसरा भारत के उत्तरपूर्वी राज्यों में से एक राज्य से सम्बंधित है। हम बात कर रहे हैं असम की। नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनावों के दौरान ये कहा था कि असम राज्य में जो लोग अवैध तरीके से आ के रहने लगे हैं उन्हें निकला जायेगा और उसके लिए राज्य में रहने वाले स्थानीय लोगों को एनआरसी के तहत खुद को पंजीकृत करवाना होगा। एनआरसी के तहत लोगों का पंजीकरण शुरू हो चुका था और आज मतलब 31 अगस्त को उसकी अंतिम सूची आ गयी है। एनआरसी की अंतिम सूची को देखा जाये तो 19 लाख लोग नागरिकता सूची से बाहर हो गए हैं।

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लेकिन ये एनआरसी है क्या ? और ये सिर्फ असम के लोगों के लिए ही क्यों बनाया गया है ?

साल 1947 में भारत के आज़ाद होने के बाद पूर्वी पकिस्तान से कई लोग असम चले आये थे। असम में पूर्वी पाकिस्तान से लोगों का ज़्यादा आना इसलिए हुआ क्योंकि असम उनके सबसे ज़्यादा करीब था। इसके बाद ही असम में अवैध रूप से लोगों का आना शुरू हो गया। लोगों के अवैध रूप से असम में आने के कारण सरकार ने साल 1951 की जनगणना के बाद पहला राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार किया था। 1971 में बांग्लादेश के बनने के बाद भी लोगों का असम में अवैध रूप से आना और वह पर रहना जारी रहा। ऐसा बताया जाता है कि 1971 भारत पकिस्तान के युद्ध के बाद लगभग 10 लाख लोग बांग्लादेश से असम चले आये थे। उस वक़्त तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था भारत में शरणार्थियों का बोझ नहीं झेला जायेगा और उन्हें वापस भेज दिया जायेगा। हालाँकि बांग्लादेश के गठन के बाद भी ये खबर आयी थी अब भी असम में करीब एक लाख लोग बांग्लादेशी थे।

असम में अचानक बांग्लादेशिओं की बढ़ती आबादी को देख कर वहाँ के स्थानीय लोगों में जाति, धर्म और संस्कृति को लेकर असुरक्षा पैदा होने लगी। जिसके बाद असम के दो संगठनों ने असम में रहने वाले बाहरी खासकर बांग्लादेशी लोगों को निकालने लने का फैसला लिया। इसे असम आंदोलन के नाम से जाना जाता है। असम आंदोलन में all assam student union और असम गण संग्राम परिषद् शामिल थे। इस आंदोलन को असमिया भाषा बोलने वाले हिन्दू, मुस्लिम और अन्य लोगों का भी समर्थन मिला। इसके बाद 1978 में असम के एक सांसद का निधन हो गया जिसके कारण असम में उपचुनाव करवाए गए। चुनावों के दौरान ये देखा गया कि मतदाताओं की संख्या अचानक से काफी ज़्यादा मात्रा में बढ़ गयी है। ऐसा माना जा रहा था कि उस समाया करीबन 35 प्रतिशत लोग बांग्लादेशी थे जो अवैध रूप से असम में रह रहे थे। वो सभी लोग मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवा चुके थे।

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आंदोलन करने वाले संगठनो ने आबादी को बढ़ता देख कर उन्होंने केंद्र सरकार के सामने कुछ मांगे रखी जिसमे शामिल था कि असम में रहने वाले सभी लोगों की जांच हो और बाहरी लोगों को मतदाता सूची से हटाया जाये। साथ ही उन्होंने ये भी मांग की थी कि बाहरी लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने तक कोई भी चुनाव नहीं होंगे। इसके बाद उनकी मांग थी कि राज्य की सीमाओं को बंद कर दिया जाये जिस से बाहरी लोगों का आना कम हो सके। बाहरी लोगों को राज्य से निकलने के लिए किया गया आंदोलन 6 साल तक चला और इस आंदोलन में लगभग 850 लोगों ने अपनी जान गवा दी। इसके बाद 15 अगस्त 1985 में असम समझौता हुआ जिसमे कुछ शर्ते राखी गयी जिनमे से एक शर्त थी कि 25 मार्च 1971 के बाद असम में आने वाले लोगों को विदेशी माना जायेगा इसके अलावा 1951 से लेकर 1961 में जो लोग असम आये थे उन्हें नागरिक माना जायेगा और मत देने का अधिकार प्राप्त होगा। लेकिन इसके साथ उन्होंने एक और शर्त रखी कि 1961 से लेकर 1971 के बीच जो लोग आये उन्हें नागरिकता तो मिलेगी लेकिन मताधिकार नहीं दिया जायेगा।

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आंदोलनकारियों की इन शर्तों के अनुसार एनआरसी को तैयार किया गया था। एनआरसी के अनुसार वो लोग जिनके पूर्वज 25 मार्च 1971 से पहले असम में आये थे केवल उन्हें ही नागरिक माना जायेगा इसके अलावा अगर कोई ये साबित नहीं कर पाता है तो उसे विदेशी घोषित कर दिया जायेगा। इसके बाद 1999 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एनआरसी को अपडेट करने का मुद्दा उठाया। हालाँकि 2004 में उनकी सरकार हटने तक इस मुद्दे पर कोई भी कदम नहीं उठाया गया। मनमोहन सिंह की सरकार में मनमोहन सिंह ने भी ये मुद्दा उठाया। काम को शुरू करने की बात हुई लेकिन इसके खिलाफ लोगों की हिंसा के चलते ये सफल नहीं हो सका। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकर को एनआरसी से सम्बंधित अंतिम निर्णय लेने का आदेश दिया। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी की प्रक्रिया को अपडेट करने का फैसला लिया और तब से ही सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर नज़र रख रहा है।

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2017 में एनआरसी के पहले ड्राफ्ट आने के बाद ये पता चला कि असम के 3.29 करोड़ की आबादी में से मात्र 1.9 करोड़ लोग ही भारतीय नागरिक घोषित हुए। इसके बाद जब 2018 में इसे फिर से जांचा गया उसके बाद 2.9 लाख लोगों को भारतीय घोषित किया लेकिन 40 लाख लोगों को सूची से बाहर कर दिया गया। जून 2019 में एक बार जांच होने के बाद एक लाख लोगों को फिर से इस सूची से बाहर कर दिया गया।

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