1965 के भारत-पाक युद्ध में माँ के इस मंदिर में नहीं फटा था एक भी बम

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भारत का राजस्थान राज्य अपने वीर-वीरांगनाओं और उनके बलिदानों की वजह से इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखवाया है. जब भी राजस्थान की बात होती है तो यहाँ के जौहर और मंदिरों की बात जरूर होती है. मंदिरों से याद आया आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएँगे जिसको देश ही नहीं अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान भी इस मंदिर की धूल सर-आंखो पर रखता है. चलिये जानते है उस माताजी का नाम और उनके चमत्कारों को.

Entry gate of temple
मंदिर का प्रवेश द्वार / फ़ोटो : rajasthantourplanner

जैसलमेर जिले के सम तहसील में एक गाँव तनोट पड़ता है. तनोट में थार रेगिस्तान है और पाकिस्तान सीमा के बिल्कुल पास बना हुया है तनोट राय माता का सिद्ध मंदिर. सिद्ध मंदिर कैसे? सिद्ध मंदिर ऐसे भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तानी सेना को धूल चटाने में तनोट माता की भूमिका बड़ी ही अहम थी. भारतीय फ़ौजियों का मानना है कि माता ने उनकी मदद की थी जिसके कारण पाकिस्तानी सेना को पीछे हटना पड़ा था. माताजी का ये मंदिर पाकिस्तानी सैनिकों के लिए भी आस्था का केंद्र है.

माता का चमत्कार

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तनोट राय माता / फ़ोटो : flickr

साल था 1965. पाकिस्तानी सेना अपनी प्लानिंग के अनुसार तनोट को तीनों तरफ़ से घेर कर भारतीय सेना पर गोलाबारी कर रही थी. दुश्मन अपनी तोपों से एक के बाद एक गोले बरसाए जा रहे थे. वही तनोट में भारतीय सेना की ओर से मेजर जय सिंह की कमांड में 13 ग्रेनेडियर की एक कंपनी और सीमा सुरक्षा बल की दो कंपनियां दुश्मन की पूरी ब्रिगेड का सामना कर रही थी. बता दूँ कि पाकिस्तान इस हिस्से पर कब्जा जमाने के हिसाब से लड़ाई कर रही थी और 4 किमी तक अंदर भी पहुँच गयी थी. पाकिस्तानी सेना द्वारा कुल 3000 गोले बरसाये गए जो अपने निशाने पर नहीं लगे और मंदिर परिसर में 450 बम गिराये गए थे लेकिन वे बम फटे तक नहीं. माता की ही कृपा थी कि भारतीय सेना ने जवाबी गोलाबारी करते हुये पाकिस्तानी सेना को वापस अपने वतन लौटने पर मजबूर कर दिया था.

जिंदा बम जो पाकिस्तान ने दागे थे / फ़ोटो : rajasthantourplanner

वो 450 जीवित बम मंदिर के संग्रहालय में रखे हुये है. जो मंदिर इस युद्ध से पहले गुमनाम था वो इस चमत्कार के बाद सबके जुबान पर आने लग गया था. मंदिर के दर्शन करने के लिए दूर-दराज से लोग आने लग गए थे.

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विजय स्तम्भ / फ़ोटो : tripadvisor

साल था 1971. पाकिस्तान अपनी करतूतों से बाज नहीं आया. 1965 में मिली हार के बाद भी तनोट को कब्ज़ा करने का नापाक इरादा नहीं बदला था. तारीख थी 4 दिसंबर इस दिन पाकिस्तान अपनी टैंक रेजीमेंट के साथ भारत की लोंगेवाला चौकी पर हमला बोल दिया. लोंगेवाला चौकी तनोट से थोड़ी सी दूरी पर ही है. उस समय भारत की ओर से सीमा सुरक्षा बल और पंजाब रेजीमेंट की एक-एक कंपनी तैनात थी. उन दोनों कंपनियों ने माता के आशीर्वाद से पाकिस्तानी टैंको पर हमला बोल कर उनका खात्मा कर दिया और सुबह भारतीय वायु सेना ने अपना काम करके पाकिस्तानी सैनिकों को जिंदा अपने वतन नहीं लौटने दिया. कुछ ही पाकिस्तानी सैनिक अपने वतन जिंदा लौट पाये और इस युद्ध में एक भारतीय जवान शहीद हो गए थे. लोंगेवाला का युद्ध पूरे विश्व में इकलौता युद्ध था जिसमें दुश्मन की सेना का एकतरफ़ा खात्मा हुया था. बाद में भारतीय सेना ने यहाँ पर एक विजय स्तम्भ बनवाया.

माता का मंदिर जो अब तक सुरक्षा बलों का कवच बना रहा, सब कुछ शांत होने पर सुरक्षा बल इसका कवच बन गये. मंदिर को बीएसएफ ने अपने नियंत्रण में ले लिया. आज यहां का सारा प्रबन्ध सीमा सुरक्षा बल के हाथों में है. यहाँ सुबह शाम आरती होती है. पुजारी भी सैनिक ही है. मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर एक सैनिक तैनात रहता है, लेकिन प्रवेश करने से किसी को रोका नहीं जाता है और फोटो खींचने पर भी कोई पाबंदी नहीं है.

ये थी माता जी ने जो चमत्कार दिये उनसे जुड़ी बातें अब बात करते है माता जी से जुड़ी कुछ बातें

माता जी की कहानी

तनोट राय माता क इतिहास / tourmyindia

बहुत पहले मामडि़या नाम के एक चारण थे. उनकी कोई संतान नहीं थी. संतान प्राप्त करने की लालसा में उन्होंने हिंगलाज शक्तिपीठ की सात बार पैदल यात्रा की. एक बार माता ने स्वप्न में आकर उनकी इच्छा पूछी तो चारण ने कहा कि आप मेरे यहाँ जन्म लें. माता की कृपा से चारण के यहाँ 7 पुत्रियों और एक पुत्र ने जन्म लिया. उन्हीं सात पुत्रियों में से एक आवड़ ने विक्रम संवत 808 में चारण के यहाँ जन्म लिया और अपने चमत्कार दिखाना शुरू किया. सातों पुत्रियाँ देवीय चमत्कारों से युक्त थी. उन्होंने हूणों के आक्रमण से माड़ प्रदेश की रक्षा की थी. माड़ प्रदेश में आवड़ माता की कृपा से भाटी राजपूतों का सुदृढ़ राज्य स्थापित हो गया. राजा तणुराव भाटी ने इस स्थान को अपनी राजधानी बनाया और आवड़ माता को स्वर्ण सिंहासन भेंट किया. विक्रम संवत 828 ईस्वी में आवड़ माता ने अपने भौतिक शरीर के रहते हुए यहाँ अपनी स्थापना की. विक्रम संवत 999 में सातों बहनों ने तणुराव के पौत्र सिद्ध देवराज, भक्तों, ब्राह्मणों, चारणों, राजपूतों और माड़ प्रदेश के अन्य लोगों को बुलाकर कहा कि आप सभी लोग सुख शांति से आनंदपूर्वक अपना जीवन बिता रहे हैं अत: हमारे अवतार लेने का उद्देश्य पूर्ण हुआ. इतना कहकर सभी बहनों ने पश्चिम में हिंगलाज माता की ओर देखते हुए अदृश्य हो गईं. 1965 के बाद से माता की पुजा सीसुब करने लगी. आपको बता दूँ तनोट राय माता को देवी हिंगलाज का रूप माना जाता है और देवी हिंगलाज का शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित हैं. जहां देवी हिंगलाज को नानी देवी से जाना जाता है.

माता के आशीर्वाद से तनोट में तैनात सैनिकों की जान का कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता है.

the panchayat

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