जब दंगे में सिख मरता रहा और उनको रहम नहीं आया

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एक नवंबर 1984, वो साल जब देश में खून की होली खेली गयी थी। ये वो समय है जिसको सिख दंगों का नाम दे दिया था। 1984 में हुए इन दंगों में आधिकारिक रूप से करीब 2700 सिखों को को मारा गया था। दंगों का निशाना बना है दिल्ली। दिल्ली के उन सभी इलाकों में इन दंगों खौफ देखा गया था जहा सिख समुदाय रहा करता था। लेकिन उस वक़्त ऐसा क्या हुआ था जिसकी वजह से देश में सिख दंगा इस तरह आग पकड़ गया था।

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ये कहानी शुरू हुई थी 1 जून 1984 से। जब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने भारतीय सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम देने का आदेश दे दिया था। ऑपरेशन ब्लू स्टार में इंदिरा गांधी ने सेना को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में छिपे बैठे सिख आतंकवादियों को मारने का हुक्म दे दिया था। सवाल उठता है कि आखिर वो सिख आतंकवादी कौन थे और वो क्या चाहते थे ? दरअसल उस समय सिख समुदाय ने ये मांग रखी थी कि उन्हें खालिस्तान नामक एक अलग देश चाहिए जिसमे सभी सिख और सरदार रहेंगे। सिख द्वारा की गयी इस मांग का सरकार ने साफ़ विरोध किया था। सरकार के विरोध से कुछ सिख इतने नाराज़ गए हो गए कि उन्होंने आतंकवादियों का रूप ले लिया और आतंकवाद फैलाना शुरू कर दिया। उनके मंसूबों में उनका साथ दे रहा था पडोसी देश पाकिस्तान। सिख आतंकवादियों के उस संगठन का करता धर्ता था जरनैल सिंह भिंडरावाले। ये वो नाम है जिसने खालिस्तान के नाम पर सिख समुदाय में आतंकवाद को बढ़ावा दिया। ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय भिंडरावाले और उनका पूरा संगठन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में छिपा हुआ था। इन सभी के पास हथियार भी थे। इंदिरा गांधी के पास इस आतंकवाद को रोकने का कोई और तरीका शायद बचा नहीं था इसलिए उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम देने का आदेश दे दिया। इस ऑपरेशन के दौरान स्वर्ण मंदिर में छिपे सभी सिख आतंकवादियों को सेना ने जान से मर दिया था। सिख आतंकवाद के करता धर्ता जरनैल सिंह भिंडरावाले को भी इस ऑपरेशन में मार दिया था।

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भारी मात्रा में सिख आतंकवादियों को मारने के बाद पूरे सिख समुदाय में आक्रोश जाग उठा था। सिख समुदाय इंदिरा गाँधी और कांग्रेस के खिलाफ हो गया था। ये आक्रोश और गुस्सा उनके अंदर काफी लम्बे समय तक रहा। इसके बाद उसी साल में देश में कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की होगी। 31 अक्टूबर 1984, ये वो तरीक है जिसे इतिहास के पन्नो में काले अक्षरों से लिखा गया है। 31 अक्टूबर की वो सुबह जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरागांधी अपने निवास से प्रधानमंत्री कार्यालय जा रही थी। वह अपने दो अंगरक्षकों के साथ थी जिनका नाम बेअंत सिंह और सतवंत सिंह था। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री कार्यालय के मुख्य द्वार पर पहुँच गयी थी। अचानक उनके एक अंगरक्षक बेअंत सिंह ने अपनी रिवाल्वर निकल कर इंदिरा गांधी के पेट में गोली मार दी। इसके बाद बेअंत सिंह ने ही अगली दो गोलियां इंदिरा गांधी के सीने में दागी। इसी दौरान इंदिरा का एक अंगरक्षक जिसका नाम सतवंत सिंह था वो भी अपनी बन्दूक के साथ वही खड़ा हुआ था। बेअंत ने गोली चलाने के बाद सतवंत को भी इंदिरा गांधी को मारने के लिए कहा। बेअंत के चीखते ही सतवंत ने भी अपनी बन्दूक की 25 की 25 गोलियां इंदिरा गांधी के शरीर पर चला दी। 25 से भी ज़्यादा गोलियों से उन दोनों अंगरक्षकों ने इंदिरा गांधी को छल्ली कर दिया था। उन्हें अस्पताल ले जाया गया जिसके बाद उनकी वही मौत हो गयी। आपको बता दें कि इंदिरा गांधी को मारने वाले वो दो अंगरक्षक सिख थे।

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31 अक्टूबर की वो तरीक देश के लिए कला दिन साबित हुई। लेकिन उसके बाद जो हुआ वो इस से भी ज़्यादा दिल दहलाने वाला था। 1 नवंबर 1984, वो दिन जब से सिख दंगों की शुरुआत हुई। इंदिरा गाँधी की मौत के अगले ही दिन दिल्ली में हंगामा हो गया था। कांग्रेस समर्थकों ने दिल्ली की सिख कॉलोनियों में हमला कर दिया था। समर्थकों का कहना था कि इंदिरा गांधी को सिखों ने मारा है इसलिए सिख देश के गद्दार हैं। इसी बात का गुस्सा था उन समर्थकों के अंदर जो बाकी के सिख समुदाय पर निकल गया। 1 नवंबर को भारी मात्रा में कांग्रेस समर्थकों ने सिखों पर हमला कर दिया और उन्हें जान से मारना शुरू कर दिया। वो समय था जब दिल्ली सहित अन्य 40 शहरों में सिखों को बचने के लिए दूसरों के घरों में छिपना पड़ रहा था। सिखों के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों ने बच्चों से लेकर बूढ़ों तक हर किसी को जान से मार दिया। ये वो दौर था जब दिल्ली पंजाब और हरियाणा में खून की होली खेली जा रही थी। सिखों के घरों में घुस कर उन्हें मारा जा रहा था। बताया जाता है कि उस समय सिखों ने दिल्ली के एक गुरूद्वारे में इकठ्ठा होने का फैसला किया था जहा से वो अपने विरोधियों का सामना करने वाले थे लेकिन तब उसी गुरूद्वारे में सिखों को मारने के लिए दंगों में शामिल लोग भरी मात्रा में आ गए और गुरूद्वारे में आये सभी सिखों को मारना शुरू कर दिया। गुरूद्वारे में एक भी सिख नहीं बचा था। इसी बीच इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी से जब इन दंगों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जो बयान दिया वो काफी समय तक सुर्ख़ियों में रहा। उन्होंने अपने बयान में कहा कि जब कोई मज़बूत पेड़ गिरता है तो आस-पास की धरती भी हिल जाती है। उनका ये बयान उस समय चर्चा का विषय बन गया था। जब इस मामले की जांच हुई तो कांग्रेस के नेता सज्जन सिंह, कप्तान भागमल, गिरधारी लाल, बलवान खोकर को मुख्य रूप से दोषी पाया गया जिसके बाद अदालत ने उन्हें दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई।

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वो घटना ऐसी थी कि अगर याद कर ली जाये तो आज भी दिल दहल उठता है। वो मंज़र क्या रहा होगा जब दिल्ली में हर तरफ बस खून ही खून था।

the panchayat

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